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​आओ फिर से मिलें ऐसे बूँदों में बूँद मिलती है जैसे ज़हन में ख्याल जैसे – कविता

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आओ फिर से मिलें ऐसे

बूँदों में बूँद मिलती है जैसे
अनजाने में एहसास जागते हैं जैसे
धूप में बारिश गिरती है जैसे
चाँदनी फैलाता चाँद जैसे
ज़हन में जज़्ब ख्याल जैसे
खाली पन्ने पर उतरे हर्फ़ों जैसे
आओ फिर से मिलें ऐसे
बूँदों में बूँद मिलती है जैसे।

चलो आज वापिस चलें
वक़्त के उस दौर में
जब भाग रहे थे हम
अपने को ढूंढने की दौड़ में
जब वक़्त अपनी मर्ज़ी से चलता था
और हमें कोई फर्क़ भी नहीं पड़ता था
उस पहली मुलाक़ात के लम्हों में
आओ फिर से मिलें ऐसे
बूँदों में बूँद मिलती है जैसे।

मैं नहीं जानता वक़्त को
कैसे पकड़ा जाता है मुट्ठी में
या कैसे कैद कर लेते हैं उसको
शायद तुम्हे भी नहीं होगा मालूम
फिर भी बेतहाशा कोशिशों में
मशगूल रहे दोनों अपनी अपनी जगह
हम खड़े रहे खुद से बंधे
वक़्त फिसलता गया हाथों से

जिंदगी ने बदल दिए रिश्ते।

जो रास्ते बुलाते हैं
और जो राह पकड़नी चाहिए
फर्क लगता ही नहीं
और वक़्त निकल जाता है
और इन सब से अलग
हम कुछ और ही राह पकड़ लेते हैं
मगर तुमने भी कभी चाहा क्या कि
आओ फिर से मिलें ऐसे
बूँदों में बूँद मिलती है जैसे?
​आओ फिर से मिलें ऐसे
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आओ फिर से मिलें ऐसे

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