कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कुछ पलों के फेर से

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एक तुम थी जो गुम थी

एक मैं था जो मिल ही नहीं पाया

हालाँकि थे हम एक ही मुकाम पर।

 

ऐसा भी हो जाता है कभी कभी

धूप और छांव की तरह

जमीन और आसमान की तरह

और

परछाई और इंसान की तरह

होते तो हम आस पास ही हैं

मगर कुछ पलों के फेर से

या तो मिल ही नहीं पाते

गोया देख तो पाते हैं

कभी कभी छू भी लेते हैं

मगर शायद इतना ही होना होता है।

 

कुछ ख्वाहिशें अधूरी या पूरी

ज़्यादा मायने नहीं रखती

ठहरना शायद किसी के लिए भी

मुनासिब नहीं होता

वक़्त तो होता है मगर

अपने हाथ में नहीं रुकता

फिसल जाता है रेत की मानिंद।

 

कुछ रह भी जाए तो

हमेशा उम्मीदों से कम ही होता है

ख्वाबों, ख्वाहिशों, और उम्मीदों के

मुकाबले हमेशा कम ही मिलता है

या फिर इंसानी फितरत ही ऐसी है

जितना भी मिले कम ही लगता है

वरना एक ही मुकाम पर हम दोनों का

एक ही वक़्त पर होना

क्या किसी लिहाज़ से कम था

फिर किस बात का गम था ?

 

कभी अपनी परछाई से

जानने की कोशिश की है कभी

कि अँधेरे में या छांव में

उसका क्या हश्र होता है

कोई न चाहने पर भी

किसी के लिए

गुम क्यूँ होता है

एक तुम थी जो गुम थी

एक मैं था जो मिल ही नहीं पाया

हालाँकि थे हम एक ही मुकाम पर।

 

कभी कभी मैं सोचता हूँ

क्या इन सब बातों के

कुछ मायने भी हैं

या यूँ ही बस ?

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है

ठहरता तो वक़्त भी नहीं है

दूर ही सही

ज़मीन और आसमान

मिलते हुए दिखते तो हैं

समुन्दर के किनारे खड़े

रेत  पर कुछ

लिखते तो हैं।

हालाँकि मालूम होता है

की अगली या उस से  अगली लहर

मिटा देगी सब कुछ

शायद वो वैसे ही रहता हो

बस ऐसा लगता हो

शायद दूर कहीं

आसमान और ज़मीं मिलते हो

सच में।

 

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है

कुछ पलों के फेर से

मैं सोचता हूँ।

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