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Poem, Poetry & Short Stories

अलबत्ता ऐसा हो जाए या ना भी हो कोई फ़र्क नहीं पड़ता अब #Poetry

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अब अलबत्ता ज़िन्दगी कुछ इस तरह से बेहतरीनतर 

हुई जाती है 

एहसास कम्बख्त दिल को बहलाने की कोशिश में 

झूठ के नज़दीकतर हुए हुए जाते हैं 

ख़ुशी नहीं भी होती तो भी 

चेहरा ग़मगीन नहीं होता 

दर्द तो अब भी वैसा ही है 

पहले जैसा, मगर

उतना महसूस नहीं होता है।

पहले मायूसी के जंगल में 

डर जाता था कभी कभी

अब तो बियावान रस्तों पे 

काँटों का हजूम 

फूलों की नज़ाकत 

के मर्सिया पड़ते हुए 

सूखे फ़ूल नशीनो के साथ 

बदहवासी का हुलूल 

हो जाए, या

ना भी हो 

कोई फ़र्क नहीं पड़ता 

अब अलबत्ता। 

 

अलबत्ता ऐसा हो जाए या ना भी हो कोई फ़र्क नहीं पड़ता अब
Photo credit: aftab. via VisualHunt / CC BY-NC

रस्म-उल-ख़त में

नुक़्ते के जो मायने हैं

वो वर्क-ऐ-ज़र्द में

ताज़गी का रुसूख़ रखते हैं

हम तेरी आरज़ू में

बेउम्मीदी में भी उम्मीद रखते हैं।

इतने बरसों के बाद अब जो

छिड़ ही गयी है तो

उस तान की ताब को महसूस

कर अब रूह तक।

ऐसा 

हो जाए, या

ना भी हो 

कोई फ़र्क नहीं पड़ता 

अब अलबत्ता।

 

दरवाज़े पे धीमी धीमी

दस्तक को सुन

तो पाँव खुद ब खुद

उठेंगे खोलने को।

सारे सवालों के मायने

बदल जायेंगे

अब ये रास्ते बेखटके

मंज़िल तक पहुंचाएंगे।

परस्तिशों की बात हो

या बात हो इबादत की

इसे अब बिदअती का

आगाज़ मान ले।

आज एक बार फिर

मेरी बात मान ले।

ऐसा 

हो जाए, या

ना भी हो 

कोई फ़र्क नहीं पड़ता 

अब अलबत्ता।

 

कुछ तो होगा

इसके पीछे भी मतलब

ये जान ले।

दो चश्मी

जो मुद्दत से तेरे

रंग में रंगे हैं

इन्हे पहचान ले।

बेतालुक़ से थे ही कब

हम तुम

फिर अब इस मुकाम पर

ऐसे क्यूँ है

ये रास्ते अब मज़िलों

से बेख़बर से क्यूँ हैं

क्यूँ नहीं तू ही चल के

आ जाये मेरे पास

ऐसा हो जाए तो फिर

और किसी मंज़िल

की ज़रूरत ही नहीं।

ऐसा 

हो जाए, या

ना भी हो 

कोई फ़र्क नहीं पड़ता 

अब अलबत्ता।

अब अलबत्ता।

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